how to prepare for upsc mains answer writing skill in in hindi

 AIS की सफलता के लिए जो सबसे बड़ी स्किल है वह अच्छा उत्तर लिखने की स्किल है। 



जी हा यदि आप AIS के एग्जाम में अच्छे अंक प्राप्त करना चाहते है तो आपको एक अच्छा उत्तर लिखने की कला खुद में विकसित करनी होगी क्यो की ऐसे बहुतो टॉपर छात्र रहे है जिन्हो ने अपने उस प्रयास में सफलता हैसिल की है जब उनका पढ़ाई का अस्तर बहुत अच्छा नहीं था। यह बात भी बिलकुल ठीक है की AIS की तैयारी के लिए केवल अधिक पढ़ना महत्पूर्ण नहीं है आप कम पढ़ कर भी सफल हो सकते है यदि आपके पास एक अच्छा आंसर राइटिंग स्किल है तो आप कम पढ़ कर भी UPSC /AIS एग्जाम अच्छे अंक प्राप्त कर सकते है और टॉपर के लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा सकते है.


क्या है आंसर राइटिंग स्किल्स ?

आंसर रइटिंग स्किल वह कला है जिसके माध्यम से आप पूछे गए प्रश्नो के उत्तर प्रश्नो के मुद्दे पर केंद्रित करते हुए लिखना है जिससे की एक सही और सटीक विस्लेसन परीक्षक के सामने उभर कर आता है. उसे ही आंसर राइटिंग स्किल कहते है।


आंसर राइटिंग स्किल का महत्व क्या है ?


 जैसा की हम जानते है की अपने आपने इस छात्र जीवन काल में बहुतो तरह के एग्जाम दिए होंगे जैसे मैट्रिक ,इंटर या और भी बहुतो तरह के एग्जाम इन सभी एग्जाम में एक बात तो समान होती है वह यह है की एग्जाम का जो परीक्षक होता है वह एग्जाम दे रहे छात्रों को बिलकुल ही नहीं जनता और उनकी आपको जानने में रत्ती भर भी रुचि नहीं है उसके पास जो आपकी उत्तर- पुस्तिका है वही आपका विजिटिंग कार्ड है और इसी उत्तर पुस्तिका के माध्यम से वह आपकी पुरे वेक्तित को समझता है फिर अंक तय करता है और UPSC के परीक्षा में 2025 में से 1700 अंक आपके लिखे हुए पर आने है यानि यदि आपका लेखन सूंदर है और उत्तर प्रश्नो पर पूरी तरह केंद्रित है तो आपको मैन्स एग्जाम मै क्वलीफाई होने से कोई रूक नहीं सकता। 


आंसर राइटिंग स्किल का इतना आधी महत्व है की UPSC में बिना आंसर राइटिंग स्किल के आप सफलत हो ही नहीं सकते क्यो की अधिकतर छात्र जो टॉप रहे है यदि आप उनसे बात करेंगे तो वह भी आपको यही कहेगे की UPSC / AIS में यदि आप टॉप करना चाहते है तो आपको अपने अंदर आंसर राइटिंग स्किल डेवेलोप करनी ही होगी। 


आंसर राइटिंग स्किल का महत्व आप इस बात से समझ सकते है की वर्ष 2008  निशान जेन ने 36 रेंक हासिल किया वह भी पहले अटेम्ट में.निशान जेन ने 36 रेंक तब हासिल किया जब उसे खुद पर भरोसा नहीं था की वह मैन्स निका पायेगा क्यों की जब उसने एग्जाम दे दिया तब उसे लग रहा था की में हिस्ट्री में अच्छा लिख नहीं पाया मुझे भरोसा नहीं होरा है की मैने आंसर सही से लिखा है फिर भी उसका मैन्स का रिजाल आया और फिर उसने इंटरव्यू दिया इंटरव्यू उसका बहुत अच्छा नहीं हुआ लेकिन जब रिजल्ट आया तो उसने 36 रेंक हासिल किया क्यों की उनकी उत्तर लेखन छमता काफी अच्छी थी। 


अंसार राइटिंग स्किल (उत्तर लेखन छमता ) कैसे डेवेलोप करे ?

इससे पहले की हम यह समझे की उत्तर लेखन छमता का विकाश कैसे करे पहले हम यह समझ लेते है की एक अच्छा उत्तर कैसा होता है। क्यो की अपने कई बार लोगो को यह कहते हुए सुना होगा की एग्जाम में यदि अपने अच्छा उत्तर लिखा तो ही आप पास कर सकेंगे वर्ण नहीं अब सबाल यह है की अच्छा उत्तर कैसा होता है उसको पहचाहने कैसे आए इसे विस्तार से समझने की कोसिस करते है। 

अच्छा उत्तर कैसे लिखे?

अच्छे उत्तर के कुछ कसौटिया 
जैसे

 (1) किसी भी अच्छे उत्तर में जो विस्तार है या उसकी जो परिधि वह उपयुक्त होनी चाहिए। 

(2) एक अच्छे उत्तर में हमेसा अनुपात और संतुलन इन दो बातो का हमेसा ध्यान रखना चहिये। 

(3) एक अच्छा उत्तर हमेसा प्रमाणिक तथ्व से भरा उत्तर होता है। 

(4) एक अच्छे उत्तर में जो भाषा होती है वह कुछ गुणों से युक्त होनी चाहिए। 

(5) एक अच्छे उत्तर में हमेसा प्रस्तुतिकरण होती है। 

 
(1) किसी भी अच्छे उत्तर में जो विस्तार है या उसकी जो परिधि वह उपयुक्त होनी चाहिए। 

ख़राब उत्तर में जो कमी होती है वह यह है की जो प्रश्न में पूछा गया है उन बातो को ठीक से न समझ कर उन बातो को उत्तर में शामिल कर दी जाती है जो प्रश्न में पूछी ही नहीं गया है ऐसा तब होता है जब आप एक्साक्ट्ली यह समझ नहीं रहे होते है की आपके द्वारा लिखे जाने वाले उत्तर प्रश्न की सही परिधि और  विस्तार कितनी है। विस्तार और परिधि के मामले में सबसे पहला नियम है की जितना प्रश्न में पूछा गया है केवल उतना ही उत्तर लिखे न उससे अधिक और न ही कम यानि प्रश्न के उत्तर में आनावश्यक बाते बिलकुल ही न लिखे और जो प्रश्न में पूछा गया है उन में से कुछ भी न छूटे क्यो की भी कभी ऐसा भी होता है की एक प्रश्न के एक से अधिक संदर्भ होते है और उन प्रश्नो के सभी संदर्भो को समझगे बिना हम प्रश्नो के एक संदर्व में उत्तर लिख देते है और दूसरे ,तीसरे संधर्व को छोर देते है अपने उत्तर मपुस्तिका में इनपर बात ही नहीं करते जिस कारण वस एग्जामनर उत्तर पुस्तिका का सही से मुल्लियाकं नहीं करता है। 


(2) एक अच्छे उत्तर में हमेसा अनुपात और संतुलन इन दो बातो का हमेसा ध्यान रखना चहिये। 

बहुतो प्रश्न ऐसे होते है जिनमे एक से अधिक पक्ष होते है यानि बहुपक्षिये प्रश्न और एक अच्छा प्रश्न उन्हें ही कहा जाता है जिन प्रश्नो के दो, तीन ,चार या पांच पक्ष बनते है और इन सभी पक्षो पर आपको लिखना होता है। इस बहुपक्षिये प्रश्न में विभिन्न पक्षो के जो अनुपात है वही अनुपात इनके उत्तर में भी  होने चाहिए। 

अनुपात प्रश्न के मांग के अनुशार लिखे। 

बहुपक्षीय प्रश्नो के उत्तर लिखने में जो सबसे बड़ी गलती होती है वह यह है की जब प्रश्न के उत्तर लिखते है तो इन प्रश्नो के एक पक्ष को हम अधिक मात्रा में लिख देते है और दूसरे पक्ष को बहुत कम मात्रा में लिखते है अब इसमें होता यह है की परीक्षक प्रश्न के माध्यम से किसी एक पक्ष के बारे में अधिक जानना चाह रहा था पर आपने किसी दूसरे पक्ष के बारे में अधिक लिख दिया आप यह समझ ही नहीं सके की परीक्षक का झुकाव किस पक्ष के और अधिक है। परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना एक मनोविज्ञान पृकिर्या है यानि प्रश्न का उत्तर ऐसा लिखे की परीक्षक को अच्छा महसूस हो और अच्छा महसूस कराने में बहुत सारे पक्ष काम करते है जिनमे एक पक्ष यह भी है की प्रश्नो को ठीक से पढ़ कर यह मालूम करने की कोसिस की जय की परीक्षक आपसे जानना क्या चाह रहा है और उसी बेस पर अपना उत्तर लिखे। यही बात इंटरव्यू में भी लागु होती है। इंटरव्यू में अंक प्राप्त करना केवल मनोविज्ञान पृकिर्या है अगर आप उस मनोविज्ञान को समझ जायेगे जिस मनोविज्ञान से परीक्षक आपसे प्रश्न पूछ रहा है इंटरव्यू में तो आप अच्छे नंबर आसानी से प्राप्त कर सकते है।  ठीक यही बात मुख्य परीक्षा में भी लागु होती है यदि आप परीक्षक के मनोविज्ञान को कैच करने में सक्षम है तो आप सभी युक्तियो समझ में आजायेगी की आप परीक्षा में कैसे अच्छे अंक प्राप्त कर सकते है। 


 यदि सी प्रश्न में आपसे आप की राय पूछी गई हो तो आप अपनी राय देते हुए हमेसा यह ध्यान में  रखे की प्रश्न के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष या जो भी दो पक्ष प्रश्न के हो सकते है उस राय के मामले में उनके बिच का संतुलन बना कर लिखे यानि पक्ष और विपक्ष की बात करते हुए संतुलन बनाय रखे एकतरफा जवाब न लिखे। इस तरह से उत्तर लिखनाऐस  ठीक समझा जाता है। 


(3) एक अच्छा उत्तर हमेसा प्रमाणिक तथ्व से भरा उत्तर होता है। 

 UPSC / AIS एग्जाम में उस उत्तर को सबसे अच्छा उत्तर समझा जाता है जो उत्तर किसी ठोस प्रमाणिकता के साथ लिखी गई हो। जब तक प्रमाण नहीं होगा आपके उत्तर में दम नहीं होगा और आप हल्की बात करने से ais नहीं सकते है कच्ची बाते मत कीजिये जैसे मान ले की आप भूगोल के छात्र है और आपको जो प्रश्न मिला है वह भगौलिक विशेषताआ के बारे में  है  तो जब तक आप नक्शे के साथ अपनी बातो को प्रजेंट नहीं करेंगे  तब तक थोड़ी न लगेगा की आप भूगोल के छात्र है अर्थात कोई क्यो माने की अपने ठीक से पढ़ाई की है जैसे यदि आप संविधान की बात कर रहे है और आपको संविधान के आर्टिकल के बारे में कुछ भी पता नहीं है तो ऐसे में कोई कैसे यकीन करेगा की अपने ठीक से पढ़ाई की है इस लिए जब भी आप उत्तर लिखे प्रमाणिक तथ्वों के साथ लिखे और प्रमाण उतने ही दे जितना आपकी बात को साबित करने के लिए हो। प्रमाणिक तथ्वों के साथ उत्तर लिखने के अलग अलग विषय के अलग अलग स्वरूप हो सकते है।  जैसे 

यदि आप राजनीति विषय का अंसार लिखते हुए आप संविधान के किसी आर्टिकल का या किसी एक्ट का जिक्र आप अपनी उत्तर पस्तिका में कर सकते है जिससे की आपकी उत्तर पुस्तक महत्व बढ़ जायेगा और परीक्षक आपकी उत्तर पस्तिका काफी प्रभावित होंगे और आपके एक अच्छे अंक प्राप्त करनी की सम्भवना बढ़ जाती है। 

यदि आप साहित्य के छात्र है तो आप पस्तिका में किसी कविता को कोट कर सकते है बस ध्यान यह रहे की इनकी भरमार न हो यह उतनी ही मात्रा में हो की आपके लिखे हुए को साबित कर दे अगर आप इतना करते है तो आप परीक्षक के नजर में बहुत प्रमाणक आभियार्थी बन जाते है। 


(4) एक अच्छे उत्तर में जो भाषा होती है वह कुछ गुणों से युक्त होनी चाहिए। 

UPSC /AIS के एग्जाम में प्रश्नो के उत्तर लिखने में जो भाषा का चुनाव करे वह उपयुक्त हो अर्थात भाषा में जो सबसे महत्वपूर्ण गुण होते है वह है प्रवाह यदि उत्तर लिखने वाले की भाषा में प्रवाह हो तो वह परीक्षक को इतना प्रभावित करता है की परीक्षक यह भी भूल जाता है की उत्तर उस प्रश्न का है की नहीं जो पूछा गया है और एक खासा अंक दे देता है। 

भाषा को लेकर जो सबसे महत्पूर्ण बात है वह है भाषा की शुद्धता यानि जब आप उत्तर लिख रहे हो तो कोसिस करे की उत्तर सुद्ध भाषा में हो अर्थात भाषा में न ग्रैमिकल मिस्टेक हो और न ही स्पेलिंग मिस्टेक हो अधिक तर छात्र जो अपनी उत्तर पुस्तिका में गलती करते है वह स्पेलिंग की गलती होती है जिस कारण उन्हें एग्जाम में भारी नुकसान का सामना करना परता है 


(5) एक अच्छे उत्तर में हमेसा प्रस्तुतिकरण होती है। 

प्रस्तुतिकरण का मतलब यह है की परीक्षक को आपका उत्तर कैस दिखाई दे जैसे यदि आपका उत्तर अच्छा है तो यह परीक्षक को प्रभावित करता है की वह उत्तर पुस्तिका को ठीक से जाँच करे और फिर उस हिसाब से अंक दे पर यदि उत्तर पुस्तिका दिखने में ही खराब लगे तो वैसी सूरत में परीक्षक आपकी उत्तर पुस्तिका की  जाँच ठीक से नहीं करेगा इस लिए यह जरूरी है की अपनी उत्तर पुस्तिका को सुंदर प्रस्तुत करे इससे आपको 5 से 10 अंक और अधिक मिलने की सम्भवना बढ़ जाती है। 



उपर्युक्त सभी बातो को धयान में रखते हुए हम निम्न प्रश्न को हल करते है ताकि हम और अच्छे से उपर्युक्त बातो को समझ सके। 

Q :- अत्यधिक असमानता , आय की असमानता से जायदा अवसरों की असमानता है।  

Ans:- हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभत्व सम्पन्न  और समस्त नागरिको को सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा व अवसरों की समता था उन सब के राष्ट्र की एकता व  अखंडता सुनिचित करने वाली संविधान को अधिनियमित व समर्पित करती है। 

भारतीय संविधान की  प्रस्तावना पर यदि एक नजर डाले  हमे पता चलता है की इनमे नागरिको को संविधान द्वारा प्रदान किये जाने वाले सभी लाभों व उपादनों का एक खाका प्रस्तुत किया गया है। 

जहा तक समता की बात है तो इनमे प्रतिस्ठा व अवसरों की समता का जिक्र किया गया है तो न्याय की संकल्पना भी बहुआयामी है अर्थात सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय का मिश्रण। शायद हमारे संविधान के निर्माण में अच्छी तरह समझा था की केवल आर्थिक असमानता या अन्याय का कर देने से जो आदर्श राज्य बनाने का स्वप्न वे देख रहे थे पूर्ण नहीं हो पाता। 

इसी कर्म में अब यदि असमानता की बात करे तो इसे भेदमूलक संकल्पना के रूप में समझा जा सकता है अर्थात किसी के पास अधिक तो किसी के पास वंचना की स्थिति का होना। किन्तु इसे केवल धन दौलत के नजरिये से देखना आँख दबाकर देखने के सामान है क्यो की यदि अवसरों के प्रकार का विवेचन करे तो इसमें आर्थिक अवसर भी आयेंगे और सामाजिक राजनैतिक संस्कृतिक भी। 


परिक्षण केवल इस बात का होना चहिये इन सभी प्रकारो का अनुपात क्या है क्या आर्थिक अवसरो में मौलिक है सभी अवसरों की नीव है अध्कि महत्पूर्ण है या अन्य अवसरों की भूमिका भी उतनी ही महत्पूर्ण है या अन्य अवसरों की भूमिका अधिक मह्पूर्ण है ?

हिन्दी के प्रसिद्ध मार्कवादी लेखक यशपाल के प्रशिद्ध उपन्यास के कथनक पर विचार करे तो उसमे एक मात्र है प्रेस्थक जो निम्न वर्ग का है किन्तु अत्यंत धनी है। धनी होने के बावजूद भी उसका पुत्र हमेशा सामाजिक समानता की तड़प में व्याकुल रहता है। वह कहता है 

जन्म का अपराध ? यदि यह जन्म का अपराध है तो उसका मार्जन किस प्रकार संभव है ? धन की शक्ति ,विध्या की शक्ति अस्त्र की सकती - कोई भी सकती जन्म के आधार पर मार्जन नहीं कर सकती (उपंन्यास दिव्या)


उपयुक्त पंक्ति के आधार पर हमे यह समझना चहिये की हर व्यक्ति की परिस्थितिया भिन्न भिन्न हो सकती है उसका जीवन दर्शन भी भिन्न प्रकार का होता है , उसके जीवन के लक्ष अकंक्षाऐ इछाओ में पर्याप्त व्यक्तिनिष्ठा विघमान होती है। इसी प्रकार व्यक्तियो के लिए असमानता के संदर्भ में भी व रायो में भिन्न होगी। यह भिन्नता इतिहास की शुरुआत से चली आ रही है। 


मनुष्य के इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है की प्रारम्भिक समाज एक समतामूलक समाज था किन्तु जैसे जैसे समाज विकाश कर गया वैसे वैसे समाज में सोपानक्रम का विकास होता गया। 


अन्य भेद जहा यूनान में आभिजात्यता साधरण वर्ग का था उनके मिथको में अमर देवता व मरणशील मानव का भी था :


अरस्तु की नजर में स्वामी व दास का भी था तो पुरष व नारी का भी था वह भरतीये समान में यह वर्णव्यवस्था के स्वरूप में से परिवर्तन होकर जाती व्यवस्था के मॉडल के रूप में सामने आया जहाँ जाती के आधार पर खान पान रहन सहन व्यवस्था विवाह भर्मण आदि के संदर्व में विभिन्न योग्ताये व निर्योग्यताये निर्धरित कर दी गई। 

यहां ध्यान देना आवश्क है की यह विभाजन आर्थिक आधार को मुख्य आधार न मानकर प्रमुख आधारों के एक भाग के रूप में मानते थे। 

इतहास में यदि सुधर आंदोलन भी हुए तो वे केवल आर्थिक स्तर पर समानता की बात नहीं करते थे. या यू कहे की समानता की तत्कालीन सुधारो में सभी वर्गे जातियों को समानदर्जा देने की बात कहि गई। 

कबीर ने जहाँ जाती पाती पूछे नहीं कोई हरि को भेजे सो हरि का कोई'  कहकर जातिगत व सामाजिक समानता स्थापित करने का प्रयास किया तो महात्मा बुध ने धम्म में पुरुष व नारी दोनों को स्थान देकर लैँगिक स्तर पर अवसरों की स्थापना स्थापित की इसी प्रकार तुलसी ने नहीं दरिद्र सम मुख जग माहि कहकर आर्थिक स्तर पर असमानता के प्रभावों का विश्लेषण किया तो सूरदास जैसे भक्तो ने कृष्ण के प्रेम में हर गोपी को डुबाकर धार्मिक अस्तर पर समानतामुल्क प्रेम की स्थापना की है। 

कुछ इसी प्रकार के सुधारो की शुरआत पश्चिम में हुए पुनजागरण में दिखाई प्रति है जहा के विचारोको  ने सामंती व्यवस्था में व्याप्त विभिन्न बहुआयामी भेदभवो को समाप्त करने का प्रयास कर आधुनिकता का सूत्रपात किया जो की आगे चलकर जे,एस मिल के लेख सब्जेक्शन ऑफ वुमेन तथा बेंथम जैसे विचारो के उपयोगितावाद 'सिद्धन्तो जहा पर व्यक्ति को एक गिना जाये का दर्शन दीखता है में तो समानता के तत्व विभिन्न स्तर तो दिखाई परते ही है। 

यह भी दिखाई पड़ता है की यहाँ पर आर्थिक असमानता को ही प्रमुख बाधा नहीं माना गया बल्कि इसे एक प्रकार का मात्र ही माना गया है। 

इसी कर्म में आगे बढ़ने पर औघ्गीकरण के साथ साथ विश्व में व्यापार बढ़े लगा तो नये पश्मी मूल्यो का एक सेट तैयार हुआ जिसकी चरम परिणीति हमे आज के वैश्वीकरण उदारीकरण , निजीक्रन  विशव में भौतिक वाद व व्यक्ति वाद के चरण  उफान में नजर आती है। 

यह के विकास का मॉडल अधिक उपयोगी को ही विकास का पैमाना मानता है और अधिक उपयोग होता है - अधिक द्रव्य धन व दौलत से / आज के समय में पैसा खुदा तो नहीं है किन्तु  खुदा से कम भी नहीं ; पैसा बोलता है '

जैसे विचार आधुनिक पीड़ी के मस्तिष्क में सर चढ़ कर बोल रहा है / इसी कारण आर्थिक असमानता को ही असमानता के प्रमुख उपकरण के रूप में देखा गया।  मार्क्स ने  अपनी पुस्तक दास कैपिटल के आर्थिक पत्र को संपूर्ण पक्षों में मुलभुत माना है तो थामस पिकेटी ने भी अपनी हालिया पुस्तक कैपिटल इन द टवेंटी फर्स्ट सूचि में पूँजी वाद व असमानता का विवेचन आर्थिक मंच पर कर इसे लोकतंत्र हेतु खतरा बताया है। 

किन्तु यह भी सर्वज्ञान है की मर्क्स के सिद्धांत पर बना  सोवियत संघ भी बिखर गया क्योकि वहाँ आर्थिक समानता के प्रयास तो हुए किन्तु राजनैतिक स्वतंत्रता व अवसरों को दबाया गया। 

विचार करने योग बात यह भी है  की भरतीये समाज व अन्य समाजो में भी हमेसा से आर्थिक तत्व को उतना महत्व नहीं मिला जितना आज मिला है भारत में प्राचीन समय में अर्थ तत्व की उपेक्षा की जाती थी व धर्म व मोक्ष तत्व पर अधिक बल दिया जाता है। 

हजरत महमद ने भी इस्वर की नजर में पुरूष नारी व सभी को एक समान बताकर समतामूलक समाज की स्थापना करने का प्रयास किया /गुरूनानक जी के सच्चा सौदा लंगर व पंगर जैसे सिद्धांत वर्णभेद को मिटा कर जातिगत समानता की बात करते है 


आगे चलकर महात्मा गाँधी ने आध्यात्मिक विकास को प्रमुख लक्ष्य घोषित किया व स्वधर्म के अनुसार जीने के अवसरों की सुजनता को प्रमुख बल दिया जहां हर धर्म लिंक ,वर्ग समाज रूप से कार्य करे अन्य पक्षों के रूप में कुछ उधारणों द्वारा समझा जा सकता है की केवल आर्थिक असमानता से अवसरों की असमानता अधिक तीर्व होती है जैसे संयुक्त राष्ट संघ के मानक विकास सूचांक के तीन आयामों में प्रतिव्यक्ति आय को एक तिहाई भरांस दिया गया है जबकि शिक्षा व स्वस्थ को शेष दो तिहाई। 


बहुआयामी गरीबी सूचांक में भी आर्थिक पक्ष का महत्व उतना नहीं है। 


यदि रोजगार शिक्षा बिजली पानी आदि अवसरों को प्रदान किये बिना केवल आर्थिक दर बढाई जाये तो इसमें केवल आंकड़े ही बढ़ेंगे वास्तविक विकास नदारद ही रहेगा। 

जहाँ तक न्याय की संकल्पना का प्रश्न है वहाँ भी न्याय व समता के लिए विधि द्वारा स्थापित प्रकिर्या यह तय करती है की समाज के साथ समान व्यवहार होने चहिये तथा आसामन के साथ आसमान व्यवहार।


संविधान में मूल अधिकारों के अनुछेद। 15 , 16 , 17 केवल आर्थिक असमानता दूर न कर  समाजिक असमानता को मिटाने की भी वकालत करते है। 

राज्य के निति निर्देश तत्व भी आर्थिक के साथ साथ सामाजिक न्याय पर बल देते है तो वही दूसरी ओर अनुछेद 324 , 325 राजनैतिक मताधिकार प्रदान कर राजनैतिक समानता प्रदान करने का प्रयास करता है। 

अंतिम रूप से यही कहा जा सकता है यदि संपूर्ण अवसरों की असमानता एक वृक्ष है तो आर्थिक असमानता जिसे आर्थिक अवसरों की समानता भी कहा जा सकता है।  उस वृक्ष की एक शाखा मात्र ही है। 

दोनों ही स्तर अत्यंत विनाशक है जो हमारे मानव जीवन हमारी सभ्यता हमारे लोकतान्त्रिक मूल्यो के समक्ष चुनौती उतपन्न करते है। 

हमारा प्रयास यही रहना चहिये की वर्गीय लैंगिक समाजिक आर्थिक राजनैतिक सभी स्तरो पर असमानता का निवारण किया जाय क्योकि एक दलित के लिए धन के बजाय समाजिक स्वकृतक व पहचान की लालसा अधिक मायने रखती है तो एक महिला के लिए स्वतंत्रता व पुरुष के समक्ष समानता स्वर्णभुसन से अधिक महत्व रखती है। 

अंत कुल मिलाकर  जीवन की सार्थकता के लिए आर्थिक समानता के साथ साथ अवसरों की विभिन्न स्तरों पर समता भी आवशयक है जैसे की दिनकर ने कहा भी है -

जब तक मनुज  का सुख भाग नहीं सम होगा शमित न होगा कोलाहल रण नहीं कम होगा। 


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